महालक्ष्मी व्रत की 16 बोल की एक कहानी कथा में छिपा है रायसेन के नीलकंठेश्वर धाम का रहस्य,एक लोटा जल चढ़ाने से मिलता है 1108 लोटे जलाभिषेक का फल, एक बेलपत्र से 1108 बेलपत्र चढ़ाने की मान्यता,राजा मगरसेन की नगरी परपट्टन से जुड़ी है महालक्ष्मी व्रत की प्राचीन कथा, 500 साल से अधिक पुराने स्वयंभू शिवलिंग के दर्शन के लिए पहुंचते हैं श्रद्धालु, आज भी पठार पर मौजूद हैं राजा के महल के अवशेष होने की मा
नरेन्द्र राय

रायसेन। महालक्ष्मी व्रत के दौरान महिलाएं हाथी पूजन (गज पूजन) करती हैं और पुरोहित से 16 बोल कीएक कहानी की प्राचीन कथा सुनती हैं। इस कथा में एक ऐसे गांव और स्थान का उल्लेख आता है, जहां भगवान शिव के एक अद्भुत शिवलिंग की महिमा जुड़ी हुई है। कथा में सुनाई देने वाले परपट्टन गांव और राजा मगरसेन का रहस्य आखिर कहां छिपा है? क्या आज भी उस स्थान का अस्तित्व है। जहां एक लोटा जल चढ़ाने से 1108 लोटे जल से अभिषेक करने और एक बेलपत्र अर्पित करने से 1108 बेलपत्र चढ़ाने के बराबर पुण्य मिलने की मान्यता है?
महालक्ष्मी व्रत की इसी प्राचीन कथा में छिपे गुमनाम स्थान की तलाश में मीडियाकर्मियों की टीम रायसेन जिले के गैरतगंज तहसील के पास स्थित पाटन गांव पहुंची। यहां मौजूद नीलकंठेश्वर धाम में 1108 रुद्रियों वाला प्राचीन शिवलिंग, राजा मगरसेन की नगरी से जुड़ी मान्यताएं और सदियों पुरानी लोककथाएं आज भी श्रद्धालुओं की श्रद्धा आस्था का केंद्र हैं। स्थानीय बुजुर्ग महिलाओं से लेकर मंदिर के महंत और पुजारियों तक, सभी इस स्थान को महालक्ष्मी व्रत की 16 बोल की एक कहानी कथा से जोड़कर देखते हैं।
कथा के बोल में छिपा है नील कंठेश्वर धाम का पता
महालक्ष्मी व्रत में हाथी पूजन के दौरान पुरोहित महिलाओं को 16 बोल की एक कहानी कथा सुनाते हैं। कथा के शुरुआती बोल हैं— “अमोती दमोती रानी, पोला पर ऊंचो सो परपाटन गांव, जहां के राजा मगरसेन, दमयंती रानी, कहे कहानी। सुनो हो महालक्ष्मी देवी रानी, हमसे कहते, तुमसे सुनते सोलह बोल की कहानी।” कथा में वर्णित परपट्टन गांव, राजा मगरसेन और रानी दमयंती के नाम आज भी पाटन गांव के लोगों की जुबान पर हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यही वह स्थान है जहां राजा मगरसेन का शासन था। और जहां भगवान शिव का दिव्य शिवलिंग स्थापित हुआ।
पाटन गांव की बुजुर्ग महिलाओं के अनुसार, महालक्ष्मी व्रत की 16 बोल की कथा में जिस परपट्टन गांव और राजा मगरसेन का उल्लेख किया गया है। वह वर्तमान में पाटन के नाम से जाना जाता है। ग्रामीणों का दावा है कि गांव के पास स्थित ऊंचे पठार पर आज भी राजा मगरसेन के महल के अवशेष मौजूद हैं। स्थानीय लोगों की मान्यता और पीढ़ियों से चली आ रही लोककथाएं इस स्थान को महालक्ष्मी व्रत की कथा से जोड़ती हैं। हालांकि, इस ऐतिहासिक संबंध की स्वतंत्र पुरातात्विक पुष्टि होना बाकी है।
श्रावण में कांवड़ियों का जमावड़ा, शिवरात्रि पर उमड़ती है भीड़
नीलकंठ धाम में वर्षभर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। श्रावण माह में भक्त नर्मदा से कांवड़ में जल भरकर लाते हैं और भगवान नीलकंठ का जलाभिषेक करते हैं। नागपंचमी, बसंत पंचमी और महाशिवरात्रि पर भी यहां विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं और बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। भक्तों का विश्वास है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यही वजह है कि जिले सहित दूर-दराज के गांवों से भी लोग इस प्राचीन धाम में माथा टेकने पहुंचते हैं।
नीलकंठ धाम से जुड़ी लोकमान्यता के अनुसार, राजा मगरसेन ने अपनी रानियों के पूजन और भगवान शिव की आराधना के लिए भोलेनाथ से प्रार्थना की थी। इसके बाद यहां दिव्य शिवलिंग की स्थापना हुई। समय बीतने के साथ यह स्थान गुमनामी में चला गया। लेकिन एक संत को भगवान शिव ने स्वप्न में यहां अपनी मौजूदगी का संकेत दिया। इसके बाद संत महात्मा ने शिवलिंग को पुनः स्थापित कराया। तभी से यह स्थान नीलकंठेश्वर धाम के नाम से प्रसिद्ध हुआ। शिव मंदिर परिसर में आज भी बावड़ी के पास सिद्ध धूनी प्रज्वलित रहती है, जिसकी अग्नि को श्रद्धालु आस्था और साधना का प्रतीक मानते हैं।
पठार पर आज भी राजा के महल के अवशेष होने की मान्यता
पाटन गांव की बुजुर्ग महिलाओं के अनुसार, महालक्ष्मी व्रत की 16 बोल की कथा में जिस परपट्टन गांव और राजा मगरसेन का उल्लेख किया गया है। वह वर्तमान में पाटन के नाम से जाना जाता है। ग्रामीणों का दावा है कि गांव के पास स्थित ऊंचे पठार पर आज भी राजा मगरसेन के महल के अवशेष मौजूद हैं। स्थानीय लोगों की मान्यता और पीढ़ियों से चली आ रही लोककथाएं इस स्थान को महालक्ष्मी व्रत की कथा से जोड़ती हैं। हालांकि, इस ऐतिहासिक संबंध की स्वतंत्र पुरातात्विक पुष्टि होना बाकी है।
एक ही शिवलिंग में 1108 रुद्रियों की मान्यता
गैरतगंज तहसील के निकट स्थित नीलकंठेश्वर धाम में स्थापित प्राचीन शिवलिंग की विशेषता इसे अन्य शिव मंदिरों से अलग पहचान रखती है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यहां एक लोटा जल अर्पित करने से 1108 लोटे जल से अभिषेक करने का पुण्य प्राप्त होता है। इसी तरह एक बेलपत्र चढ़ाने पर 1108 बेलपत्र अर्पित करने के बराबर पुण्य मिलने की मान्यता है। शिव मंदिर में स्थापित शिवलिंग को स्वयंभू माना जाता है और इसकी जलहरी भी चौकोर आकार की है। स्थानीय लोगों के अनुसार, यह शिव धाम 500 वर्ष से अधिक प्राचीन है और लंबे समय से क्षेत्र के श्रद्धालुओं की धार्मिक आस्था का केंद्र बना हुआ है।
राजा मगरसेन की प्रार्थना से प्रकट हुए भोलेनाथ
नीलकंठेश्वर से धाम से जुड़ी लोकमान्यता के अनुसार, राजा मगरसेन ने अपनी रानियों के पूजन और भगवान शिव की आराधना के लिए भोलेनाथ से प्रार्थना की थी। इसके बाद यहां दिव्य शिवलिंग की स्थापना हुई। समय बीतने के साथ यह स्थान गुमनामी में चला गया।लेकिन एक संत को भगवान शिव ने स्वप्न में यहां अपनी मौजूदगी का संकेत दिया। इसके बाद संत महात्मा ने शिवलिंग को पुनः स्थापित कराया। तभी से यह स्थान नीलकंठेश्वर धाम हरदौट के नाम से प्रसिद्ध हुआ। मंदिर परिसर में आज भी बावड़ी के पास सिद्ध धूनी प्रज्वलित रहती है।जिसकी अग्नि को श्रद्धालु आस्था और साधना का प्रतीक मानते हैं।
पठार पर आज भी राजा के महल के अवशेष होने की मान्यता
पाटन गांव की बुजुर्ग महिलाओं के अनुसार, महालक्ष्मी व्रत की 16 बोल की कथा में जिस परपट्टन गांव और राजा मगरसेन का उल्लेख किया गया है, वह वर्तमान में पाटन के नाम से जाना जाता है। ग्रामीणों का दावा है कि गांव के पास स्थित ऊंचे पठार पर आज भी राजा मगरसेन के महल के अवशेष मौजूद हैं। स्थानीय लोगों की मान्यता और पीढ़ियों से चली आ रही लोककथाएं इस स्थान को महालक्ष्मी व्रत की कथा से जोड़ती हैं। हालांकि, इस ऐतिहासिक संबंध की स्वतंत्र पुरातात्विक पुष्टि होना बाकी है।
श्रावण में कांवड़ियों का जमावड़ा, शिवरात्रि पर उमड़ती है भीड़
नीलकंठेश्वर धाम में वर्षभर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। श्रावण माह में भक्त नर्मदा से कांवड़ में जल भरकर लाते हैं और भगवान भोलेनाथ नीलकंठ का जलाभिषेक करते हैं। नागपंचमी, बसंत पंचमी और महाशिवरात्रि पर्व पर भी यहां विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं और बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। भक्तों का विश्वास है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यही वजह है कि दूर-दराज के गांवों से भी लोग इस प्राचीन शिवालय धाम में माथा टेकने पहुंचते हैं।
कथा सुनने वाले लाखों, लेकिन स्थान से अनजान हैं कई लोग
महालक्ष्मी व्रत की 16 बोल की एक कहानी कथा मध्यप्रदेश सहित कई क्षेत्रों में महिलाओं के बीच प्रचलित है। हर साल व्रत के दौरान इस कथा को सुनने और सुनाने की परंपरा निभाई जाती है।लेकिन कथा में वर्णित परपट्टन गांव और उससे जुड़े नीलकंठेश्वर धाम के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। पाटन गांव के स्थानीय लोग इसे अपनी ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत मानते हैं। मंदिर के महंत महाकाल बाबा यहां नियमित रूप से भगवान शिव की सेवा और पूजा-अर्चना करते हैं। उनका कहना है कि नीलकंठेश्वर धाम की महिमा और इतिहास पीढ़ियों से श्रद्धालुओं के बीच प्रचलित है।
कथा वाचक राम कृपाल शास्त्री और मंदिर के पुजारी पंडित नीरज शर्मा सहित स्थानीय श्रद्धालु भी इस शिव धाम को महालक्ष्मी व्रत की कथा से जुड़ा बताते हैं। महिला भक्तों के अनुसार, कथा में जिस स्थान का वर्णन किया जाता है, उसे अपनी आंखों से देखना उनके लिए आस्था और जिज्ञासा से जुड़ा अनुभव है। नीलकंठेश्वर धाम की यह कहानी केवल एक मंदिर की महिमा तक सीमित नहीं है, बल्कि लोकपरंपरा, धार्मिक आस्था और पाटन गांव की पुरानी पहचान को भी सामने लाती है।