शाखा तंत्र, प्रार्थना मंत्र और कार्यकर्ता यंत्र… युवा सम्मेलन में राष्ट्र निर्माण का संकल्पसंघ के शताब्दी वर्ष पर सिलवानी में जुटे सैकड़ों स्वयंसेवक, शाखा में खेल-बौद्धिक गतिविधियों के बाद युवाओं से संवाद

नरेन्द्र राय रायसेन सिलवानी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में संघ खंड सिलवानी द्वारा युवा सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें नगर सहित ग्रामीण अंचलों से बड़ी संख्या में स्वयंसेवक और युवा शामिल हुए। सम्मेलन में शाखा की गतिविधियों से लेकर राष्ट्र निर्माण, सामाजिक समरसता, नागरिक अनुशासन और सांस्कृतिक पहचान जैसे विषयों पर विचार रखे गए।कार्यक्रम की शुरुआत एक घंटे की संघ शाखा से हुई। शाखा में स्वयंसेवकों ने खेल, बौद्धिक एवं मानसिक विकास से जुड़ी गतिविधियों में सहभागिता की। इसके साथ गीत, अमृतवचन और सुभाषित के माध्यम से शाखा का क्रम पूरा हुआ। इसके बाद युवा सम्मेलन के तहत युवाओं से संवाद और उद्बोधन का कार्यक्रम हुआ। सामूहिक गीत के दौरान स्वयंसेवकों ने सामूहिकता और एकजुटता का संदेश दिया।युवा शक्ति देश के भविष्य की सबसे बड़ी पूंजीमुख्य वक्ता विदिशा विभाग के सह विभाग प्रचारक सुधांशु जी ने कहा कि भारत की युवा शक्ति देश के भविष्य की सबसे बड़ी पूंजी है। युवाओं को राष्ट्र, समाज और संस्कृति के प्रति अपने दायित्वों को समझकर सकारात्मक और रचनात्मक भूमिका निभानी चाहिए। राष्ट्र निर्माण केवल सरकार का दायित्व नहीं है, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति और विशेषकर युवाओं की सक्रिय सहभागिता से ही सशक्त और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण संभव है।उन्होंने युवाओं से भारतीय संस्कृति, परंपराओं और देश के गौरवशाली इतिहास को समझने का आह्वान किया। साथ ही अनुशासन, सेवा, समरसता और राष्ट्रभक्ति जैसे मूल्यों को जीवन में अपनाने पर जोर दिया।‘भाषा, भूषा, भजन, भोजन और भ्रमण अपना हो’सह विभाग प्रचारक ने कहा कि घर की चारदीवारी के भीतर भाषा, भूषा, भजन, भोजन और भ्रमण अपना होना चाहिए। उन्होंने नागरिक कर्तव्य और नागरिक अनुशासन को दैनिक जीवन में देशभक्ति प्रकट करने का माध्यम बताया। उन्होंने कहा कि समाज की सज्जन शक्ति को सक्रिय होने की आवश्यकता है और समाज के सभी वर्गों को एक-दूसरे का पूरक बनकर काम करना चाहिए।एक हजार साल की पराधीनता से लेकर ‘स्व’ के बोध तक चर्चासम्मेलन में भारत की सांस्कृतिक विरासत और इतिहास पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि भारत ने दुनिया को अंक ज्ञान, संगीत, शिक्षा और परिवार व्यवस्था सहित अनेक क्षेत्रों में दिशा दी। इसके बावजूद देश को करीब एक हजार वर्षों तक पराधीनता का सामना करना पड़ा। संघर्षों के बावजूद भारत ने अपनी सांस्कृतिक पहचान और अस्तित्व को बनाए रखा।वक्ताओं ने हिंदू समाज की एकता, सांस्कृतिक पहचान, धर्म के व्यापक अर्थ, सामाजिक समरसता और संगठन की भूमिका पर विचार रखे। समाज को जोड़ने वाली पहचान, ‘स्व’ के बोध और गुण-संपन्न समाज के निर्माण की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया। संघ की कार्यपद्धति और समाज में किए जा रहे विभिन्न सामाजिक प्रयासों की जानकारी भी दी गई।युवाओं ने रखे सवाल और जिज्ञासाएंयुवा सम्मेलन में युवाओं ने राष्ट्र और समाज से जुड़े विभिन्न विषयों पर अपने विचार और जिज्ञासाएं रखीं। वक्ताओं ने युवाओं को समाजहित में सक्रिय योगदान देने और सामाजिक दायित्वों के प्रति जागरूक रहने के लिए प्रेरित किया। संघ के शताब्दी वर्ष में समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संपर्क और संवाद को और व्यापक बनाने पर भी जोर दिया गया।कार्यक्रम का समापन भारत माता की आरती के साथ हुआ। सम्मेलन में संघ के पदाधिकारी, स्वयंसेवक, युवा कार्यकर्ता, गणमान्य नागरिक एवं बड़ी संख्या में युवा और बहनें उपस्थित रहीं।