पुरुषोत्तम मास में अविरल बह रही दुग्धाभिषेक की धारा, नीलकंठ वर्णी की मानसरोवर तपस्या और श्रीमद्भागवत की दिव्य कथाओं से भक्त हुए भावविभोर11 जून की एकादशी पर होगा आम्रोत्सव एवं महापूजा, 100 से अधिक दंपति करेंगे सहभागिता

कथा में गौमहिमा, तृणावर्त उद्धार, गर्गाचार्य नामकरण और भक्ति की महत्ता का हुआ वर्णनबुरहानपुर। पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर शहर के प्राचीन स्वामीनारायण मंदिर में भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक उत्साह का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है। मंदिर में भगवान लक्ष्मीनारायण देव एवं हरिकृष्ण महाराज का दुग्ध, केसर और पंचामृत से दिव्य अभिषेक किया जा रहा है। भगवान के चरणों में अर्पित होने वाली दुग्धाभिषेक की धारा लगातार 24वें दिन भी अविरल रूप से प्रवाहित होती रही। भगवान के दिव्य अभिषेक और दर्शन के लिए प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंच रहे हैं।मंदिर के मीडिया प्रभारी गोपाल देवकर ने बताया कि पुरुषोत्तम मास के दौरान प्रतिदिन विशेष धार्मिक आयोजन हो रहे हैं। इसी क्रम में 11 जून को निर्जला एकादशी के अवसर पर दिव्य अभिषेक, आम्रोत्सव और भव्य महापूजा का आयोजन किया जाएगा। इस विशेष महोत्सव में 100 से अधिक दंपति सहभागिता कर भगवान का पूजन-अर्चन करेंगे तथा परिवार, समाज और राष्ट्र की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करेंगे।धर्मसभा को संबोधित करते हुए मंदिर के महंत पूज्य कोठारी पी.पी. स्वामी ने भगवान स्वामीनारायण की नीलकंठ वर्णी अवस्था की दिव्य तपश्चर्या का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि भगवान स्वामीनारायण ने बाल्यावस्था में ही घर त्यागकर संपूर्ण भारत का वन-विचरण किया और धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा भक्ति का संदेश दिया। अपने विचरण के दौरान वे कैलाश पर्वत के समीप स्थित पवित्र मानसरोवर क्षेत्र पहुंचे, जहां उन्होंने कठोर तपस्या कर संपूर्ण मानवता के लिए आदर्श प्रस्तुत किया।स्वामी ने बताया कि शास्त्रों के अनुसार भगवान का प्रत्येक कार्य जीवों के कल्याण के लिए होता है। मानसरोवर में जब नीलकंठ वर्णी के दर्शन हेतु अनेक हंस पहुंचे, तब भगवान ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा कि भविष्य में वे परमहंस रूप में जन्म लेकर भगवान की भक्ति और सेवा का लाभ प्राप्त करेंगे। स्वामीनारायण परंपरा में परमहंसों का स्थान अत्यंत गौरवपूर्ण माना जाता है। वे भगवान के निकट रहकर धर्म और सत्संग के प्रचार-प्रसार का कार्य करते हैं।इस अवसर पर भारत-तिब्बत समन्वय संघ द्वारा कोठारी स्वामी को एक संकल्प-पत्र भेंट किया गया। इसमें भगवान शिव से प्रार्थना की गई कि श्रद्धालुओं को कैलाश मानसरोवर के दर्शन करने का सौभाग्य सहज रूप से प्राप्त हो तथा यह पवित्र क्षेत्र सनातन संस्कृति के अनुयायियों के लिए सुलभ बने। संघ के सदस्यों ने विश्व शांति, सांस्कृतिक संरक्षण और राष्ट्रहित की कामना भी की तथा हे भोलेनाथ, हिमालय पर्वत पर हमे कैलाश मानसरोवर में आपके दर्शन करने की शक्ति प्रदान करें ।

हम बिना वीज़ा बिना पासपोर्ट आपको नमन करने कैलाश मानसरोवर पहुंच सके, आप अपने मूल स्थान कैलाश मानसरोवर को पापी चीन के कब्जे से मुक्त कराईये,, मुक्त कराईये,, मुक्त कराईये वहीं व्यासपीठ से पूज्य शास्त्री चिंतनप्रियदासजी स्वामी ने श्रीमद्भागवत महापुराण की कथा का रसपान कराते हुए भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं, असुर उद्धार और भक्ति के गूढ़ रहस्यों का विस्तार से वर्णन किया।उन्होंने वत्सासुर (ष्टकासुर) उद्धार प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान केवल राक्षसों का विनाश नहीं करते, बल्कि उनके उद्धार का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं। भागवत में वर्णित ये प्रसंग मानव जीवन में छिपे अहंकार, कपट और दुष्प्रवृत्तियों को समाप्त करने का संदेश देते हैं।कथा के दौरान गौमाता के महत्व का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि शास्त्रों में गौ को समस्त देवताओं का निवास स्थान बताया गया है। स्कंद पुराण, महाभारत और अन्य धर्मग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि जहां गौमाता का वास होता है, वह स्थान स्वतः पवित्र, मंगलमय और पुण्यदायी बन जाता है। गौसेवा से मनुष्य के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है।उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में मनुष्य को केवल भौतिक उन्नति पर नहीं, बल्कि अपने स्वभाव और संस्कारों के परिष्कार पर भी ध्यान देना चाहिए। अथर्ववेद में पृथ्वी को माता बताया गया है। “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” अर्थात यह पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं। इसलिए प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है।भारत की आध्यात्मिक महिमा का वर्णन करते हुए स्वामी ने कहा कि भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति और भक्ति का केंद्र है। संतों ने भारत शब्द की व्याख्या करते हुए कहा है कि “भा” का अर्थ भक्ति और प्रकाश है तथा “रत” का अर्थ उसमें निरंतर लीन रहना है। इस प्रकार भारत वह भूमि है जो सदैव भक्ति और आध्यात्मिकता में रत रहती है।कथा में हिरण्याक्ष और तृणावर्त उद्धार के प्रसंगों का भी वर्णन किया गया। स्वामी ने बताया कि भगवान अधर्म और अहंकार का अंत कर धर्म की स्थापना करते हैं। तृणावर्त की कथा यह संदेश देती है कि भगवान की शरण में आने वाला प्रत्येक जीव अंततः कल्याण को प्राप्त करता है।गर्गाचार्य द्वारा भगवान श्रीकृष्ण के नामकरण संस्कार का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने बताया कि जब भगवान के प्राकट्य को एक वर्ष पूर्ण हुआ तब नंदबाबा ने महर्षि गर्गाचार्य को आमंत्रित कर नामकरण संस्कार सम्पन्न कराया। शास्त्रों में भगवान के नाम की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है कि भगवान के नाम, स्वरूप, गुण और लीला में कोई भेद नहीं है। श्रद्धा और विश्वास के साथ भगवान का नाम-स्मरण करने मात्र से जीव का कल्याण संभव है।धर्मसभा के अंत में संतों ने श्रद्धालुओं से पुरुषोत्तम मास का अधिकाधिक लाभ उठाने, सत्संग, जप, तप, दान, सेवा और भगवान के नाम-स्मरण में जीवन को समर्पित करने का आह्वान किया।