मोहना संगम पर नीलकंठ वर्णी की स्मृति में हुआ भगवान का नौका विहार जलझूलनी एकादशी पर संतों और हरिभक्तों ने भक्ति-भजनों के साथ मनाया पर्व, आगामी वर्षों में 1500 से 2500 श्रद्धालुओं के साथ आयोजन की तैयारी

बुरहानपुर। जलझूलनी एकादशी के पावन अवसर पर स्वामीनारायण मंदिर के संतों एवं हरिभक्तों ने मोहना संगम पहुंचकर भगवान की प्रतिमा का नौका विहार कराया। भगवान स्वामीनारायण के नीलकंठ वर्णी स्वरूप में बुरहानपुर आगमन की स्मृतियों से जुड़े इस पवित्र स्थल पर संतों ने भजन-कीर्तन एवं रास के साथ जलझूलनी एकादशी उत्साहपूर्वक मनाई। आयोजन संत कोठारी पी.पी. स्वामी, चंद्रप्रकाश स्वामी शास्त्री, चिंतनप्रियदासजी शास्त्री तथा पार्षद दिनेश भगत के सानिध्य में हुआ।भगवान स्वामीनारायण के नीलकंठ वर्णी स्वरूप से जुड़ा है मोहना संगमस्वामीनारायण संप्रदाय की मान्यता के अनुसार भगवान स्वामीनारायण ने बाल्यावस्था में गृह त्याग के बाद नीलकंठ वर्णी के रूप में भारतभर में पदयात्रा करते हुए अनेक तीर्थों का भ्रमण किया था। इसी आध्यात्मिक यात्रा के दौरान नीलकंठ वर्णी बुरहानपुर क्षेत्र में पहुंचे थे।मोहना संगम को भगवान स्वामीनारायण की इसी आध्यात्मिक यात्रा की स्मृतियों से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है। मान्यता है कि नीलकंठ वर्णी ने यहां संगमेश्वर महादेव की पूजा, स्थापना और आराधना की थी। यही कारण है कि स्वामीनारायण संप्रदाय के अनुयायियों के लिए मोहना संगम धार्मिक आस्था और आध्यात्मिक स्मृति का महत्वपूर्ण केंद्र है।जलझूलनी एकादशी का धार्मिक महत्वभाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी को जलझूलनी एकादशी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवान की प्रतिमा को जल विहार कराया जाता है।

वैष्णव परंपरा में इसे परिवर्तिनी एकादशी भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार चातुर्मास के दौरान भगवान योगनिद्रा में रहते हैं और इस एकादशी पर करवट बदलते हैं, इसलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है।इसी तिथि को भगवान विष्णु के वामन अवतार की स्मृति से जोड़कर वामन एकादशी भी कहा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी धार्मिक परंपराओं में भी इस दिन का विशेष महत्व माना गया है। मान्यता है कि माता यशोदा ने बाल कृष्ण को जन्म के बाद पहली बार स्नान कराया था तथा भगवान श्रीकृष्ण की गोपियों के साथ जलक्रीड़ा की कथाएं भी इस पर्व से जुड़ी हैं।संतों के साथ हरिभक्तों ने कराया नौका विहारमोहना संगम पर भगवान की प्रतिमा का विधिवत पूजन-अर्चन किया गया। इसके बाद भगवान को नौका में विराजित कर जल विहार कराया गया। संतों एवं हरिभक्तों ने भगवान के जयघोष के साथ नौका विहार किया। इस दौरान भक्ति गीत, भजन और रास का आयोजन हुआ। हरिभक्तों ने उत्साह के साथ भगवान की आराधना करते हुए जलझूलनी एकादशी का पर्व मनाया।शास्त्री चिंतनप्रियदासजी स्वामी ने कहा कि जलझूलनी एकादशी हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। कोठारी पी.पी. स्वामी की प्रेरणा से मोहना संगम पर इस आयोजन की शुरुआत की गई है। आने वाले वर्षों में इसे और व्यापक स्वरूप देते हुए 1500 से अधिक हरिभक्तों की उपस्थिति में मेले के रूप में आयोजन करने का प्रयास किया जाएगा।1500 से 2500 हरिभक्तों के लिए होगी भोजन प्रसादीकोठारी पी.पी. स्वामी ने कहा कि आने वाले वर्षों में समूचा सत्संग मंडल मोहना संगम पहुंचकर इस आयोजन को भव्य स्वरूप देगा। भविष्य में 1500 से 2500 तक हरिभक्तों के लिए भोजन प्रसादी की व्यवस्था भी की जाएगी। इससे यह आयोजन सामूहिक सत्संग, भक्ति और धार्मिक आस्था का बड़ा केंद्र बनेगा।चंद्रप्रकाश स्वामी ने आयोजन में शामिल सभी हरिभक्तों को आशीर्वाद प्रदान किया।जन्मदिन पर किया श्रद्धा से अभिनंदनआयोजन के दौरान स्वामीनारायण मंदिर के पूर्व ट्रस्टी स्व.सोमेश्वर मर्चेंट के जन्मदिवस पर श्रद्धा सुमन अर्पित कर उन्हें याद किया गया, वहीं मंदिर के वर्तमान ट्रस्टी नटवर भगत का जन्मदिवस भी हरिभक्तों की मौजूदगी में उत्साहपूर्वक मनाया गया।इस अवसर पर मंदिर के ट्रस्टी नटवर भगत, श्री सकल पंच गुजराती मोड़ वणिक समाज ट्रस्ट के अध्यक्ष रमेश दलाल, हरिभक्त किशोर शाह, गोपाल देवकर, उपेंद्र गुजराती, अजय सुगंधी (हार्डवेयर वाले), रामकिसन दास मिस्त्री, रामकिशन शाह, उमेश शाह, पंकज शाह, वीरेंद्र शाह सहित महिला भक्ति मंडल की सदस्य एवं बड़ी संख्या में हरिभक्त मौजूद रहे।