निर्धन भीलू मानकर के निधन पर कोगावा में गांव की एकता भाईचारे और इंसानियत की मिसाल सामने आई

। रिपोर्टर नवीन रायली एक की पीड़ा बनी पूरे गांव का दर्द, कोगावां ने दिखाई इंसानियत की मिसाल*भीलू मानकर के निधन पर अंतिम संस्कार से बारहवें तक का खर्च ग्रामीणों ने मिलकर उठाया, कार्यक्रम के बाद बचा गेहूं और 4500 रुपए भी परिवार को सौंपे*कसरावद। खरगोन जिले की कसरावद तहसील के ग्राम कोगावां में एक बार फिर गांव की एकता, भाईचारे और इंसानियत की तस्वीर सामने आई। गांव के भीलू मानकर के निधन के बाद परिवार पर आई विपरीत परिस्थिति में ग्रामीणों ने उन्हें अकेला नहीं छोड़ा। एक परिवार की पीड़ा को पूरे गांव ने अपना दर्द समझा और मिलकर अंतिम संस्कार से लेकर बारहवें तक की पूरी व्यवस्था में सहयोग किया।मृत्यु वाले दिन की आवश्यक व्यवस्थाओं से लेकर बारहवें की पगड़ी और भोजन सहित पूरे कार्यक्रम का खर्च ग्रामीणों ने मिल-जुलकर उठाया। इसके लिए गांव में लोगों ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार नगद राशि और गेहूं एकत्र किया। किसी ने आर्थिक सहयोग दिया तो किसी ने गेहूं देकर इस सेवा कार्य में अपनी भागीदारी निभाई।कार्यक्रम के लिए मीना चौबे शिक्षक की ओर से 2500 रुपए का सहयोग दिया गया। वहीं गांव में कार्यक्रम के लिए एकत्र किए गए गेहूं में से करीब डेढ़ क्विंटल गेहूं कार्यक्रम के बाद बच गया। ग्रामीणों ने इस बचे हुए गेहूं को भीलू मानकर के परिवार को सौंप दिया।इसी तरह कार्यक्रम के लिए ग्रामीणों से एकत्र की गई नगद राशि में से खर्च के बाद 4500 रुपए बच गए थे। यह राशि भी परिवार को सौंप दी गई, ताकि आगे की जरूरत में परिवार के काम आ सके।*दुख की घड़ी में दिखी गांव की असली ताकत*इस पूरे सेवा कार्य की खास बात यह रही कि इसमें किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे गांव की सामूहिक भागीदारी रही। ग्रामीणों ने अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग किया और यह सुनिश्चित किया कि आर्थिक परेशानी के कारण परिवार को अंतिम संस्कार या अन्य सामाजिक कार्यक्रमों में किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।कोगावां के ग्रामीणों की यह पहल केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने गांव की उस पुरानी परंपरा को भी जीवंत किया, जिसमें किसी एक घर का सुख पूरे गांव का सुख और किसी एक परिवार का दुख पूरे गांव का दुख माना जाता है।आज जब भागदौड़ भरी जिंदगी में लोगों के बीच आपसी दूरी बढ़ती जा रही है, ऐसे समय में कोगावां की यह तस्वीर समाज के लिए एक सकारात्मक संदेश है। यह घटना बताती है कि गांव आज भी केवल घरों का समूह नहीं, बल्कि आपसी संवेदना, सहयोग और भाईचारे से जुड़ा एक परिवार है।*यही तो गांव की पहचान है*ग्रामीणों के इस सामूहिक प्रयास को देखकर यह महसूस होता है कि हमारे पूर्वजों ने गांवों को केवल रहने के लिए नहीं बसाया था। उन्होंने ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनाई थी, जहां मुसीबत में कोई अकेला न रहे और जरूरत के समय हर हाथ मदद के लिए आगे आए।भीलू मानकर के परिवार के दुख में कोगावां के ग्रामीणों ने जिस तरह एकजुट होकर साथ दिया, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक सीख है।एकता केवल साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि जरूरत के समय एक-दूसरे के साथ खड़े होने का नाम है। कोगावां ने इसी भावना को अपने व्यवहार से साबित किया है।“एक की पीड़ा बनी पूरे गांव का दर्द”—यह केवल खबर की हेडलाइन नहीं, बल्कि कोगावां की जीवित परंपरा और इंसानियत की पहचान बन गई।