योग और गुरु का संगम ही मनुष्य को शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है।”गुरु मंत्रों के साथ ध्यान, प्राणायाम और योगाभ्यास द्वारा गुरु के वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक महत्व को समझाया गया

*गुना। गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर गायत्री मंदिर, गुना में एक विशेष योग, ध्यान एवं प्राणायाम सत्र का आयोजन किया गया। यह विशेष साधना योगाचार्य महेश पाल के मार्गदर्शन में संपन्न हुई, जिसमें बड़ी संख्या में साधकों, युवाओं एवं योग प्रेमियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य केवल योगाभ्यास कराना नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा के वास्तविक स्वरूप, गुरु के वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक महत्व तथा जीवन में उसके प्रभाव को समझाना था।कार्यक्रम की शुरुआत वैदिक मंगलाचरण एवं गुरु मंत्रों के उच्चारण से हुई। इसके पश्चात प्रतिभागियों ने गहन ध्यान, नाड़ी शोधन प्राणायाम, भ्रामरी प्राणायाम एवं ओम् के दीर्घ उच्चारण का अभ्यास किया। योगाचार्य महेश पाल ने बताया कि जब गुरु मंत्रों के साथ ध्यान किया जाता है, तब मन की चंचलता धीरे-धीरे शांत होने लगती है। आधुनिक विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि नियमित ध्यान एवं प्राणायाम से मस्तिष्क में अल्फा एवं थीटा तरंगों की सक्रियता बढ़ती है, जिससे तनाव कम होता है, एकाग्रता बढ़ती है, मानसिक संतुलन विकसित होता है तथा तंत्रिका तंत्र अधिक संतुलित रूप से कार्य करता है।उन्होंने कहा कि “गुरु” शब्द का अर्थ ही है—’गु’ अर्थात अंधकार और ‘रु’ अर्थात उसका नाश करने वाला। गुरु वह है जो अज्ञान, भ्रम, भय और नकारात्मकता के अंधकार को दूर कर ज्ञान, विवेक, आत्मविश्वास और सत्य के प्रकाश की ओर ले जाता है। जिस प्रकार सूर्य अपने प्रकाश से संसार का अंधकार दूर करता है, उसी प्रकार गुरु अपने ज्ञान से मनुष्य के जीवन का अज्ञान दूर कर उसे सही दिशा प्रदान करता है।योगाचार्य महेश पाल ने मानव जीवन के दो महत्वपूर्ण पक्षों—भौतिक जीवन और आध्यात्मिक जीवन—पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि भौतिक जीवन हमें जीविका, परिवार और समाज के प्रति उत्तरदायित्व निभाना सिखाता है, जबकि आध्यात्मिक जीवन हमें आत्मचिंतन, आत्मानुशासन, करुणा, सत्य, सेवा और मानवता के मार्ग पर चलना सिखाता है। गुरु इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना सिखाते हैं, जिससे मनुष्य केवल सफल ही नहीं, बल्कि श्रेष्ठ और संवेदनशील भी बनता है।उन्होंने कहा कि आज के समय में बढ़ता तनाव, अवसाद, क्रोध, प्रतिस्पर्धा और जीवनशैली संबंधी विकार इस बात का संकेत हैं कि मनुष्य बाहरी विकास तो कर रहा है, लेकिन आंतरिक शांति से दूर होता जा रहा है। ऐसे समय में गुरु का मार्गदर्शन, योग, ध्यान और प्राणायाम मनुष्य को स्वयं से जोड़ते हैं तथा मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाते हैं।योगाचार्य महेश पाल ने यह भी बताया कि गुरु केवल धार्मिक शिक्षा देने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह जीवन का सच्चा मार्गदर्शक होता है। गुरु हमें सही निर्णय लेने, नैतिक मूल्यों का पालन करने, अनुशासन अपनाने, सेवा भावना विकसित करने तथा समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने की प्रेरणा देता है। गुरु के सान्निध्य में व्यक्ति के विचार, व्यवहार और चरित्र का सकारात्मक निर्माण होता है। अंत में सभी साधकों ने गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए संकल्प लिया कि वे योग, ध्यान एवं प्राणायाम को अपने दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएंगे तथा गुरु द्वारा बताए गए सत्य, सेवा, अनुशासन और मानव कल्याण के मार्ग पर चलकर स्वस्थ, संतुलित एवं आदर्श समाज के निर्माण में अपना योगदान देंगे।