हुकमचंद कछवाय : जनसंघ और मीसाबंदी के तप से निकले एक तपस्वी जनप्रतिनिधि93वीं जयंती पर विशेष | 23 जुलाई— डॉ. नवीन आनंद जोशी

SJ NEWS MP इरफान अन्सारी, उज्जैन हुकमचंद कछवाय : जनसंघ और मीसाबंदी के तप से निकले एक तपस्वी जनप्रतिनिधि93वीं जयंती पर विशेष | 23 जुलाई— डॉ. नवीन आनंद जोशी, भोपालभारतीय लोकतंत्र का इतिहास केवल सत्ता परिवर्तन का इतिहास नहीं, बल्कि उन जननायकों की तपस्या का इतिहास भी है जिन्होंने राजनीति को सेवा, संघर्ष और समर्पण का माध्यम बनाया। ऐसे ही विरले जनप्रतिनिधियों में एक नाम है हुकमचंद कछवाय का, जिनकी 23 जुलाई को 93वीं जयंती मनाई जाएगी।कहा जाता है कि जनसंघ के शुरुआती दौर में उन्हें उज्जैन लोकसभा से टिकट दिलाने में राजमाता विजयाराजे सिंधिया और अटल बिहारी वाजपेयी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। वे जनसंघ के सक्रिय संगठनकर्ता और बाद में एक प्रभावशाली सांसद के रूप में उभरे।संसद में मुखर आवाजहुकमचंद कछवाय अपनी संसदीय सक्रियता के लिए विशेष रूप से जाने जाते थे। उनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने लोकसभा में हजारों प्रश्न उठाए और 1970 के दशक में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों, जिनमें परमाणु नीति का मुद्दा भी शामिल था, को प्रमुखता से रखा।संसदीय नियमों और कार्यवाही पर उनकी मजबूत पकड़ के कारण राजनीतिक गलियारों में उन्हें “कोरम किंग” के नाम से भी जाना जाता था।आपातकाल और 19 महीने की जेल1975 में लागू आपातकाल के दौरान वे मीसाबंदी रहे और लगभग 19 महीने जेल में रहे। यह दौर उनके राजनीतिक जीवन का सबसे कठिन लेकिन निर्णायक चरण माना जाता है। लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए उनका संघर्ष आज भी जनसंघ-भाजपा परंपरा में याद किया जाता है।श्रमिकों के लिए संघर्षउज्जैन की कपड़ा मिलों के श्रमिकों की समस्याओं को लेकर उनका संघर्ष विशेष रूप से चर्चित रहा। स्थानीय राजनीतिक स्मृतियों के अनुसार, श्रमिकों की मांगों को लेकर उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के काफिले के सामने विरोध प्रदर्शन किया और मजदूरों की बात राष्ट्रीय नेतृत्व तक पहुँचाई।मुरैना के डाकुओं के आत्मसमर्पण का प्रसंगउनके जीवन से जुड़ा एक उल्लेखनीय प्रसंग मुरैना क्षेत्र में 32 डाकुओं के आत्मसमर्पण से भी जोड़ा जाता है। समर्थकों का मानना है कि सामाजिक संवाद और विश्वास निर्माण की उनकी भूमिका ने उस प्रक्रिया को गति देने में योगदान दिया।जनता के बीच रहने वाले नेताहुकमचंद कछवाय की सबसे बड़ी पहचान उनकी जनसुलभता थी। गरीब, मजदूर, किसान, व्यापारी, विद्यार्थी या कर्मचारी—हर वर्ग का व्यक्ति उन्हें अपना प्रतिनिधि मानता था। वे समस्याएँ सुनने के साथ-साथ समाधान होने तक निरंतर प्रयास करते थे।अटल युग के प्रेरणास्रोतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी उनकी अध्ययनशीलता, संगठन क्षमता और संसदीय सक्रियता के प्रशंसक बताए जाते हैं। जनसंघ के कठिन दिनों में उन्होंने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर संगठन और विचार को रखा।आज के दौर के लिए संदेशआज जब राजनीति में जनता और जनप्रतिनिधियों के बीच दूरी बढ़ती दिखाई देती है, तब हुकमचंद कछवाय का जीवन याद दिलाता है कि लोकतंत्र की असली शक्ति जनता के बीच रहने, उनकी पीड़ा को समझने और उनके संघर्ष को अपना संघर्ष मानने में है।उनकी 93वीं जयंती पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि और शत-शत नमन।