सिस्टम की मेहरबानी या दबंगों का खौफ? इंदौर में दलितों की जमीन पर अवैध कब्जा, न्याय के लिए दर-दर भटक रहे किसान

इंदौर/खुड़ैल/संजय मौर्य/इंदौर जिले से एक बेहद गंभीर और स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाने वाला मामला सामने आया है। खुडैल तहसील के ग्राम उज्जैनी में दबंगों द्वारा दलितों की जमीनों पर खुलेआम अवैध कब्जा किया जा रहा है। विडंबना यह है कि सिस्टम की चौखट पर न्याय की गुहार लगाने के बावजूद, पीड़ित किसानों को प्रशासन की लापरवाही और दबंगों की दहशत के साये में जीने को मजबूर होना पड़ रहा है।खेतों में जाने पर मारपीट और गालियांग्राम उज्जैनी में हालात इतने तनावपूर्ण हो गए हैं कि दलित किसानों को उनके ही खेतों में जाने से रोका जा रहा है। यदि कोई किसान हिम्मत करके अपने खेत की ओर रुख करता है, तो गांव के दबंग खुलेआम गाली-गलौज और मारपीट पर उतारू हो जाते हैं। इस गुंडागर्दी के कारण पीड़ित परिवारों में भारी डर और असुरक्षा का माहौल व्याप्त है। वे अपनी ही जमीन पर जाने से खौफ खा रहे हैं।फाइलों के चक्रव्यूह में फंसा न्यायपीड़ितों ने न्याय पाने के लिए हर दरवाजा खटखटाया है। 181 सीएम हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराने से लेकर कलेक्टर और एसपी कार्यालय तक आवेदन दिए जा चुके हैं। लेकिन प्रशासनिक संवेदनहीनता का आलम यह है कि वरिष्ठ अधिकारी इन आवेदनों पर केवल ‘रिमार्क’ लिखकर फाइलें वापस उन्हीं निचले स्तर के अधिकारियों को सौंप देते हैं, जो इस मामले में पहले से ही कोई कार्रवाई नहीं कर रहे हैं। शिकायत निवारण के नाम पर हो रही इस खानापूर्ति ने पीड़ितों को और अधिक निराश कर दिया है।मुख्यमंत्री से लगाई न्याय और सुरक्षा की गुहारदबंगों के खौफ और स्थानीय प्रशासन के सुस्त रवैये से हताश होकर, अब इन पीड़ित दलित किसानों ने सीधे प्रदेश के मुख्यमंत्री महोदय से हस्तक्षेप की मांग की है। उनकी प्रमुख मांगें हैं:अवैध कब्जे से मुक्ति: मामले का शीघ्र और निष्पक्ष निराकरण कर किसानों को उनकी जमीन वापस दिलाई जाए।कठोर कार्रवाई: कानून को हाथ में लेने वाले और मारपीट करने वाले दबंगों पर सख्त कानूनी कार्रवाई हो।सुरक्षा की गारंटी: पीड़ित परिवारों और किसानों को उनके खेतों तक जाने के लिए तत्काल पुलिस सुरक्षा प्रदान की जाए।यह मामला केवल जमीन के टुकड़े का नहीं, बल्कि समाज के एक कमजोर वर्ग के सम्मान और जीने के अधिकार का है। अब देखना यह है कि क्या प्रशासन कुंभकर्णी नींद से जागेगा और उज्जैनी के इन किसानों को न्याय मिल पाएगा, या फिर फाइलों के बोझ तले इनकी आवाज भी हमेशा के लिए दब जाएगी?