अपेक्षाओं से जन्म लेती है मन की अशांति, स्वयं के मन को बदलने का प्रयास करें : मुनिश्री कुन्थुसागर जी महाराज

रमाकांत मोरे बुरहानपुर। परम पूज्य मुनिश्री 108 कुन्थुसागर जी महाराज ने चातुर्मास की बेला में “जब मन दुखी और अशांत हो तो क्या करना चाहिए” विषय पर भावपूर्ण प्रवचन देते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन में सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं, लेकिन मन की शांति हमारे अपने विचारों और भावनाओं पर निर्भर करती है। मुनिश्री ने कहा कि मन की अशांति का सबसे बड़ा कारण हमारी अपेक्षाएं हैं। जब हम किसी व्यक्ति से अपेक्षा करते हैं और वह पूरी नहीं होती, तो मन दुखी हो जाता है। किसी से प्रेम और विश्वास के बावजूद अपेक्षित व्यवहार नहीं मिलने पर मन में पीड़ा उत्पन्न होती है। ऐसी स्थिति में हमें दूसरों को बदलने के बजाय अपने मन को बदलने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि मन अशांत हो तो सबसे पहले यह विचार करना चाहिए कि अशांति का वास्तविक कारण क्या है। यदि किसी व्यक्ति के व्यवहार से मन दुखी है, तो बार-बार उसी बात को सोचते रहने से समस्या कम नहीं होगी, बल्कि मन की पीड़ा और बढ़ेगी। इसलिए परिस्थितियों को स्वीकार करते हुए अपने विचारों को सकारात्मक दिशा देना चाहिए। मुनिश्री ने कहा कि जीवन में हर व्यक्ति हमारी इच्छा के अनुसार व्यवहार करे, यह संभव नहीं है। हमें यह समझना होगा कि दूसरों के व्यवहार पर हमारा नियंत्रण नहीं, लेकिन उस व्यवहार के प्रति अपनी प्रतिक्रिया पर हमारा नियंत्रण अवश्य है। मन में क्षमा, संतोष, संयम और सकारात्मक भाव रखने से अशांति धीरे-धीरे दूर होने लगती है। उन्होंने कहा कि मन को शांत रखने के लिए अपेक्षाओं को कम करना, दूसरों की गलतियों को क्षमा करना और अपने भीतर झांकना आवश्यक है। जब व्यक्ति अपने सुख का आधार दूसरों के व्यवहार को बनाने के बजाय अपने आत्मिक भावों को बनाता है, तब वह विपरीत परिस्थितियों में भी शांत रह सकता है। कार्यक्रम की जानकारी देते हुए समाज के महेंद्र जैन लुहाड़िया एवं प्रमोद जैन बड़जात्या ने बताया की आज के प्रवचन के दौरान धर्मप्रेमी कैलाश पाटनी, सुमेरचंद बड़जात्या, किरण हुमड़, जम्बू कुमार पहाड़िया, राजेंद्र लुहाड़िया, सुनील पाटनी , पवन ठोलिया एवं वीरेंद्र बड़जात्या सहित समाजजन व् बड़ी संख्या में महिलाये उपस्थित रहे ।
